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हरिवंश राय बच्चन बायोग्राफी | Harivansh Rai Bachchan Bio in Hindi

हरिवंश राय बच्चन भारत के मशहुर हिंदी भाषी कवि और लेखक थे। इलाहाबाद के प्रर्वतक हरिवंश हिंदी कविता के के उत्तर छायावादी के प्रमुख कवियो मे से एक है। इनकी सबसे मशहुर कृति मधुशाला है। हरिवंश को भारत के लोकप्रिय कवियों मे गिना जाता है।

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# व्यक्तिगत जानकारी
अभिभावक – प्रताप नारायण श्रीवास्तव, सरस्वती देवी
जन्म – 27 नंवम्बर 1907 इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
जीवनसाथी – श्यामा(1926-36), तेजी बच्चन(1941-2007)
बच्चे – अमिताभ बच्चन, अजिताभ बच्चन
भाषा – अवधी, हिंदी
राष्ट्रीयता – भारतीय
मृत्यु – 18 जनवरी 2003 मुम्बई, महाराष्ट्र

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# जीवन परिचय: हरिवंश जी को बचपन मे बच्चन के नाम से पुकारा जाता था, जिसका शाब्दिक अर्थ है बच्चा या संतान जो बाद हरिवंश जी के नाम से जुड गया और हरिवंश राय बच्चन बन गया। इलाहाबाद मे पैदा हुए बच्चन ने अपनी पढाई भी इलाहाबाद से की है। 1938 मे हरिवंश जी ने इलाहाबाद विश्वविधालय से अंग्रजी मे मे एम.ए() किया और फिर 1952 तक इलाहाबाद विश्वविधालय मे प्रवक्त्ता रहे। हरिवंश 1952 मे पढने के लिए इंग्लैंड चले गये वहां कैम्ब्रिज विश्वविधालय मे अंग्रेजी साहित्य(काव्य पर शोध किया और फिर 1955 मे वापस भारत आकर भारत सरकार विदेश मंत्रालय मे हिंदी विशेषज्ञ के रुप मे नियुक्त हो गये।

इसी बीच 1926 मे हरिवंश जी कि शादी श्यामा के साथ हो गयी लेकिन श्यामा को टीबी की बीमारी के कारण 1936 में उनकी देहांत हो गया। 1941 मे हरिवंश जी ने तेजी बच्चन के साथ दूसरी शादी कि, अमिताभ बच्चन इन्ही के पुत्र है। हरिवंश जी व्यक्तिवादी गीत कविता या हालावादी काव्य के अग्रणी कवि है। अपनी काव्य यात्रा के प्रारंभिक दौर के दौरान हरिवंश जी उमर खैय्याम से के जीवन दर्शन से बहुत ही प्रभावित रहे है, हरिवंश जी की प्रसिध्द कृति मधुशाला उमर खैय्याम के रुबाइयों से प्रभावित होकर लिखी गयी थी। हरिवंश राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे है और 1976 मे पद्म भुषण की उपाधी मिली थी। इससे पहले हरिवंश जी को दो चट्टाने(कविता संग्रह) के लिए 1968 मे अकादमी पुरस्कार भी मिला था।

Harivansh Rai Bachchan

# प्रसिध्द कृतियां: मधुबाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, सतरंगिनी, विकल विश्व, खादी के फुल, सूत की माला, मिलन, दो चट्टाने, आरती और अंगारे।

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# हरिवंश जी की लिखी हुयी छोटी कविताएं
उसके नयनों का जल खारा,
है गंगा की निर्मल धारा,
पावन कर देगी तन-मन को क्षण भर साथ बहो,
दुखी-मन से कुछ न कहो

# शीर्षक – ओ गगन के जगमगाते दीप
दीन जीवन के दुलारे
खो गये जो स्वप्न सारे,
ला सकोगे क्या उन्हें फिर खोज हृदय समीप
ओ गगन के जगमगाते दीप
यदि न मेरे स्वप्न पाते,
क्यों नहीं तुम खोज लाते
वह घड़ी चिर शान्ति दे जो पहुँच प्राण समीप
ओ गगन के जगमगाते दीप
यदि न वह भी मिल रही है,
है कठिन पाना-सही है,
नींद को ही क्यों न लाते खींच पलक समीप
ओ गगन के जगमगाते दीप

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