तुलसीदास जी का जीवन परिचय (Tulsidas Bio in Hindi)

तुलसीदास राम के परम भक्तो मे से एक माने जाते थे, तुलसीदास ने भगवान राम को और उनसे अपने भक्ति को नये आयाम पर लेकर गये। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस को रचकर अपनि भक्ति को सिध्द किया है, लोग इन्हे महर्षि वाल्मिकी जी कि अवतार मानते है। महाकव्य रामचरितमानस को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय काव्यो मे 46वां स्थान दिया गया है।  

तुलसीदास

तुलसीदास (Tulsidas) जीवन परिचय

इनका जन्म स्थान विवादित है। कुछ लोग मानते हैं की इनका जन्म सोरो शुकरक्षेत्र, आज के समय मे एटा (कासगंज), उत्तर प्रदेश मे हुआ था। कुछ विद्वान् इनका जन्म राजापुर जिला बांदा आज के समय का चित्रकुट में हुआ मानते हैं। जबकि कुछ विद्वान तुलसीदास का जन्म स्थान राजापुर मानने के पक्ष मे है। इनके पिताजी का नाम पं. आत्माराम शुक्ल और माता का नाम हुलसी था। संवत् १५११ के श्रावण मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में इन्हीं दम्पति के यहाँ तुलसीदास का जन्म हुआ। प्रचलित जनश्रुति के अनुसार शिशु बारह महीने तक माँ के गर्भ में रहने के कारण अत्यधिक हृष्ट पुष्ट था और उसके मुख में दाँत दिखायी दे रहे थे। जन्म लेने के साथ ही उसने राम नाम का उच्चारण किया जिससे उसका नाम रामबोला पड़ गया। उनके जन्म के दूसरे ही दिन माँ का निधन हो गया। पिता ने किसी और अनिष्ट से बचने के लिये बालक को चुनियाँ नाम की एक दासी को सौंप दिया और स्वयं विरक्त हो गये। जब रामबोला साढे पाँच वर्ष का हुआ तो चुनियाँ भी नहीं रही। वह गली-गली भटकता हुआ अनाथों की तरह जीवन जीने को विवश हो गया।

तुलसीदास (Tulsidas) बचपन

तुलसीदास का पहला नाम तुलसीराम रखा गया था, तुलसीदास कि जिद्द से उब कर रत्नावली ने उन्हे स्वरचित एक दोहे के माध्यम से तुलसीराम को तुलसीदास बनने के लिए मजबुर किया था। वो दोहा कुछ इस प्रकार से था।

स्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति ,

नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत ।

इसके बाद से उन्होने अपनी पत्नी को अपने ससुर के पास ही छोडकर वापस अपने गांव लौट गये, राजापुर में अपने घर जाकर जब उन्हें यह पता चला कि उनकी अनुपस्थिति में उनके पिता भी नहीं रहे और पूरा घर नष्ट हो चुका है तो उन्हें और भी अधिक कष्ट हुआ। 29 साल के उम्र तुलसीदास जी कि शादी राजापुर से थोडी ही दूर यमुना के उस पार स्थित एक गाँव की अति सुन्दरी भारद्वाज गोत्र की कन्या रत्नावली के साथ उनका विवाह हुआ। एक दिन बारीश रात मे तुलसीदास अपने पत्नी से मिलने चले गये और तभी उनकी पत्नी रत्नावली ने उन्हे ये दोहा सुनाया था, जिसके बाद तुलसीदास रमा के नाम मे लिन हो गये थे।

Tulsidas

भगवान राम का दर्शन

कुछ दिन राजापुर मे समय बिताने के बाद तुलसीदास जी वापस से कासी चले गये, जहां पर उन्हे एक मनुष्य के वेश मे एक प्रेत निला जिसने उन्हे हनुमान जी का पता बताया। इसके बाद तुलसीदास जी हनुमान जी से मिलने के लिए चल दिये और हनुमान जी से मिलने के बाद भगवान राम से मिलने कि इच्छा जाहीर किया तो हनुमान जी ने उन्हे बताया कि चित्रकुट मे भगवान राम उन्हे दर्शन देंगे।

भगवान राम जब दर्शन देने आये थे तभी हनुमान जी ने एक दोहा कहा था, जो इस प्रकार से था।

चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर,

तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर।

दैवयोग के इस वर्ष रामनवमी पर भी वैसा ही दिन आया जैसा त्रेता युग मे राम जी के जन्म पर आया था, इसी दिन को तुलसीदास ने रामचरितमानस को लिखना शुरु किया और करीब 2 साल 7 माह 26 दिन मे इस ग्रंथ को खत्म किया था। इसके बाद बगवान के मन से तुलसीदास जी वापस से काशी चले गये और वहां पर भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपुर्णा को श्रीरामचरितमानस सुनाया, किताव वहीं विश्वनाथ जी के मंदिर मे छोडकर आ गये। सुबह जब मंदिर का पट खोला गया तो लोग अचंभीत हो गये क्योकि किताब पर सत्यं शिवं सुंदरम् लिखा हुआ पाया गया था जिसके निचे शंकर जी ने पुष्टी कर रखा था।

तुलसीदास जी के कुछ दोहे | Tulsidas ji ke Dohe

Tulsidas ji ke Dohe

काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान,
तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान,

सुख हरसहिं जड़ दुख विलखाहीं, दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं
धीरज धरहुं विवेक विचारी, छाड़ि सोच सकल हितकारी 

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर,
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर

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